स्वार्थ और निस्वार्थ
मानवता प्रकृति द्वारा दिया गया एक वरदान है और एक उपहार भी। क्योंकि मनुष्य जाति एक सामाजिक बंधनों से बंधा हुआ वर्ग है ,जो अपने साथ-साथ अपने संबंधियों ,पड़ोसियों और आसपास के लोगों के कल्याण के लिए काम करता है। हमारा किया हुआ प्रत्येक कार्य दूसरों पर प्रभाव डालता है और दूसरों के द्वारा किए गए कार्य हमारे ऊपर प्रभाव डालते है ।
इसलिए जैसे हम खुद हैं वैसा ही हमें समाज मिलता है ,वैसा ही हमारे साथ व्यवहार किया जाता है। इसलिए जिम्मेदारी यह बनती है कि हम वही कार्य करें जो हमें स्वयं के लिए पसंद है ।देखने में आता है कि हम अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरों के लिए काटे उत्पन्न करते हैं तो अपने लिए पुष्प मालाएं सजाते हैं ।जबकि हमें यह पता नहीं होताकि उन मालाओं के साथ साथ कांटे भी लगे होते हैं जो हम दूसरों के लिए बिछाने का प्रयास करता है । इसलिए जब भी हम जो भी कार्य करें वह दूसरों को ध्यान में रखकर करें। दूसरों की भलाई में ही हमारी भलाई निहित है । जो व्यक्ति जितना चतुर ,चालाक ,स्वार्थी और कंजूस होता है उसको उसी प्रकार के लोग मिलते हैं जो व्यक्ति जितना कल्याणकारी ,समन्वय वादी ,दयालु और निस्वार्थ होता है , उसको समाज इज़्ज़त करता है उसके लिए कठिन कार्य भी सहज होते
है ।उसका जीवन सरल ,सहज और सफल बन जाता है।
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