इस्लाम में रमज़ान
इस्लाम धर्म के पांच सिद्धांतों में तीसरा स्थान रमजान का आता है. इस्लामिक कैलेंडर के नवें महीने का नाम रमजान है. यह पूरा महीना बहुत ही मुबारक और रहमत वाला होता है. इसमें सभी बालिग मर्द औरत सुबह सूरज निकलने से पहले से सूरज डूबने तक कुछ भी खाना पीना नहीं करते हैं और अपनी इंद्रियों को वश में करने का अभ्यास करते हैं. रोज़े की हालत में, झूठ बोलना, चोरी करना, किसी को दुःख पहुंचना ही नहीं, पति पत्नी भी संभोग से दूर रहते हैं. यह एक बहुत ही पवित्र और अनुशासन के पालन का महीना होता है. शाम को इफ्तार के समय सभी अपने अपने घरों में मिल कर एकसाथ रोज़ा खोलते हैं और एक अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं. इस महीने में दान और परोपकारिता को बढ़ चढ़ किया जाता है. इस महीने के अंतिम दस दिनों में इबादत ज्यादा की जाती है, अंतिम दस दिनों की 5 विशेष रातें इबादत की दृष्टि से रखी गयीं है जिनको शबेकदर कहा जाता है, इन्हीं 5 रातों में एक रात ऐसी होती है जिसकी इबादत हजार रातों से बेहतर होती है. 29 या 30 दिन के बाद (जब चाँद निकल आए) उसके अगले दिन ईद उल फितर का त्यौहार मनाया जाता है, जो मुसलमानों का सबसे बड़ा त्यौहार है. यह एक तरह से रमजान के महीने के रोज़े रखने का शुक्र अदा करने का दिन होता है, सभी बच्चे और बड़े नए नए कपड़े पहनते हैं और दो रकत ईद की नमाज़ अदा करते हैं. घरों में सिवईं और मीठे पकवान बनते हैं. बच्चों को ईदी के रूप मे उपहार और पैसे दिए जाते हैं. सभी एक दूसरे को ईद की मुबारकबाद देते हैं. उस दिन भी निर्धनों को दान दिया जाता है ताकि वो भी इस खुशी में शामिल हो सकें.
डॉ जुल्फिकार
ए .एम.यू. अलीगढ़
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